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105 साल पहले गांधी आकर चले गए, बदला कुछ नहीं: पंडित की जिद गांधी को चंपारण ले आई, सरकार सड़क-कॉलेज तक न दे सकी

 

इस तस्वीर से किसी झील में चल रही स्टीमर को देखने का भ्रम हो सकता है। लेकिन यकीन कीजिए, यह एक सड़क है और इसपर कार चल रही है। यह कोई ऐसी-वैसी सड़क भी नहीं है। यह रास्ता बेतिया के उस सतवरिया गांव को जाता है, जहां के रहनेवाले राजकुमार शुक्ल की जिद ने गांधीजी को चंपारण आने के लिए मजबूर कर दिया था।

मैं जब पटना से सतवरिया जाने के लिए सुबह 6 बजे निकली थी तो सोचा नहीं था कि पंडित राजकुमार शुक्ल के गांव जाने के लिए ऐसे रास्ते से गुजरना पड़ेगा। सड़क की यह हालत देखकर लगा कि 105 साल पहले जब गांधी यहां आए थे, तब से लेकर अभी तक कुछ नहीं बदला है। खैर, आगे जो कुछ भी मैंने देखा, वो आप भी जानिए –

उस रास्ते से हम बड़ी ही मुश्किल से निकले, तब हमें राजकुमार शुक्ल के नाम पर बनाया हुआ एक सुनसान महाविद्यालय दिखा। इसे देखकर ऐसा महसूस हो रहा था, मानों वहां कई सालों से कोई भी नहीं आया होगा। छात्र तो दूर वहां गाय और भैंसों को बांधा गया था।

राजकुमार शुक्ल के नाम पर बने इस कॉलेज से निराश हैं स्थानीय लोग।

स्थानीय लोगों ने बताया कि इस कॉलेज में कभी पढ़ाई नहीं होती। और तो और यहां एक नहीं, दो प्रिंसिपल हैं। बच्चे यहां दोनों ही प्रिंसिपल के पास एडमिशन लेते हैं। फिर जिस प्रिंसिपल का एडमिशन बोर्ड से अप्रूव होता है, उनके छात्र परीक्षा दे पाते हैं, बाकी छात्र ऐसे ही रह जाते हैं। खैर यह कहानी भी कभी अलग से बताऊंगी।

वहां से आगे बढ़ने पर हम पहुंच चुके थे शुक्ल के घर। लेकिन उनके घर की स्तिथि बहुत ही जर्जर दिखी। उस घर के हर सदस्य के चेहरे पर मायूसी छाई हुई थी। मानों एक आस में है कि कभी ना कभी तो कोई चमत्कार होगा और इस गांव की स्तिथि में सुधार आएगा।

शुक्ल का घर।

घर में हमें एक बुजुर्ग दिखाई दिए, जो राजकुमार शुक्ल के पड़पोते शशि भूषण थे। परिचय देने पर उन्होंने हमें बुलाकर बिठाया। फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। उन्होंने बताया कि राजकुमार शुक्ल की सबसे बड़ी चिंता नील की खेती थी, जिसका वह हमेशा विरोध करते रहे।

शुक्ल ने जब इसके खिलाफ आवाज बुलंद की, तब अंग्रेजों ने कई बार केस में फंसाकर जेल भेज दिया। वह नहीं माने तो अंग्रेजों ने जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर इनाम की घोषणा कर दी। शुक्ल के पास जब कोई और रास्ता नहीं बचा, तब उन्होंने महात्मा गांधी को चंपारण बुलाने की जिद की।

शुक्ल के पड़पोते समेत गांव के लोगों का दर्द है कि सरकार महोत्सवों में करोड़ों खर्च कर देती है, सुविधा के नाम पर कुछ नहीं मिलता।

शशि भूषण के पास शुक्ल की एक अनमोल डायरी है। इसमें उन्होंने सत्याग्रह के समय से लेकर गांधी के साथ अपनी बैठकों सहित हर एक घटना का विवरण दर्ज किया है। हालांकि उस डायरी को पढ़ पाना मेरे लिए मुश्किल था, क्योंकि वह कैथी लिपि में लिखी गई थी।

गांव के लोगों का दर्द है कि जब साल 2017 में जब चंपारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा था, तब उस कार्यक्रम में करोड़ों रुपए खर्च किए गए थे। लेकिन सतवरिया गांव आज भी विकास को तरस रहा है। सड़कों पर पड़े कुपोषित बच्चे बता रहे थे कि देश की राजधानी दिल्ली में लहराता तिरंगा और पटना के विधानसभा के घंटा घर की गूंज यहां से ना तो दिखाई देती है और ना ही सुनाई पड़ती है।

 

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