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नीतीश अब CM की कुर्सी छोड़ने को तैयार हैं तो NDA क्यों छोड़ा ? RJD से क्या मिला जो BJP ने नहीं दिया ?

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महागठबंधन सरकार की दूसरी पारी में नीतीश एक तरह से तेजस्वी यादव का राजनीतिक करियर बनाने का बीड़ा उठा चुके हैं। दूसरी तरफ तेजस्वी भी शिष्यवत समर्पण भाव से नीतीश से राजनीति और सरकार के गुर सीख रहे हैं।

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 24 घंटे के अंदर दो बार खुलकर बता दिया है कि महागठबंधन सरकार के अगले मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव होंगे। पहले सोमवार को बिहारशरीफ में नीतीश ने कहा कि उन्होंने बहुत काम कर लिया है और अब आगे तेजस्वी यादव काम करेंगे। फिर मंगलवार को पटना में महागठबंधन दलों के विधायकों की मीटिंग में कहा कि 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा।

नीतीश ने कहा कि उनमें प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री पद की लालसा नहीं है, अब उनका एक ही मकसद है- 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हराना। उस बीजेपी को हराना अब नीतीश कुमार का लक्ष्य बन चुका है जिसके साथ गठबंधन की सरकार में वो सबसे ज्यादा वक्त तक केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री रहे।

सवाल उठता है कि जब नीतीश कुमार महागठबंधन सरकार बनाने के चार महीने के अंदर इस बात के लिए तैयार हो चुके हैं कि वो तेजस्वी यादव के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे, तो उन्होंने एनडीए क्यों छोड़ दिया। नीतीश को बीजेपी से क्या दिक्कत थी, बीजेपी का सीएम बनाने से क्या दिक्कत थी जब अब वो आरजेडी के सीएम के लिए मन बना चुके हैं। नीतीश ने बहुत सुलझे तरीके से तेजस्वी की ताजपोशी की तारीख यह कहकर उलझा दी है कि तेजस्वी 2025 के विधानसभा चुनाव का नेतृत्व करेंगे।

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इसका एक मतलब ये भी निकलता है कि 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले 2024 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन का नेतृत्व बिहार में नीतीश ही करेंगे। एक बात तो साफ है कि तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने का तारीख नीतीश खुद तय करेंगे जो उनके अब तक के संकेतों के हिसाब से 2024 के चुनाव के आस-पास या उसके बाद भी हो सकता है।

नीतीश का मन पढ़ पाना उनकी पार्टी के नेताओं के लिए भी पहेली है। इसलिए नीतीश ने जब तेजस्वी के उत्तराधिकारी होने का ऐलान किया तो आश्चर्यजनक रूप से बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल मीडिया से यह कहते दिखे कि अब बीजेपी दोबारा कभी जेडीयू को साथ नहीं लेगी। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष ने ये भी कहा कि जेडीयू के जाल में फंस चुके तेजस्वी कभी बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बन सकते।

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यहां नीतीश कुमार अपने उत्तराधिकारी का ऐलान कर रहे हैं और बीजेपी जेडीयू से दोबारा हाथ मिलाने या ना मिलाने पर बात कर रही है। अब इसका क्या मतलब निकाला जाए ये बीजेपी के अंदर का खेल समझने वाला कोई नेता ही बता सकता है या फिर जेडीयू में बीजेपी के पैरवीकार नेताओं में से कोई एक।

जेडीयू को नजदीक से देख रहे कुछ पत्रकारों से जब लाइव हिन्दुस्तान ने यह समझने की कोशिश की कि अगर नीतीश को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार होना ही था तो बीजेपी में क्या बुराई थी जिसके साथ वो इतने लंबे समय से राजनीति कर रहे हैं तो कई रोचक बात सामने आई।

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एक तो ये कि नीतीश को बीजेपी से दिक्कत 2014 से शुरू हुई जिसकी वजह से महागठबंधन बना और 2015 में उसकी सरकार भी बनी। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के दौर की बीजेपी की आक्रामकता नीतीश कुमार पचा नहीं पा रहे थे जिन्हें अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के जमाने की बीजेपी में काफी महत्व मिला। बीजेपी नेतृत्व के साथ इस बदले समीकरण में कई मौके आए जब नीतीश मन मसोस कर रह गए।

संजय झा, आरसीपी सिंह जैसे नेताओं की सलाह पर नीतीश दोबारा बीजेपी के पास गए। 2020 के चुनाव में नीतीश की पार्टी जेडीयू विधानसभा में बीजेपी से छोटी हो गई लेकिन बीजेपी ने नीतीश को ही सीएम बनाया। नीतीश के साथ भरोसेमंद पारी खेल चुके सुशील कुमार मोदी को पार्टी ने पटना से पैक करके दिल्ली रवाना कर दिया। जो नए नेता लगाए गए, उनके साथ नीतीश को ताल-मेल बिठाने में दिक्कत होती रही।

 

बीजेपी के कुछ नेताओं का हाव-भाव भी नीतीश को पसंद नहीं आ रहा था जो यह जताते रहते थे कि जेडीयू छोटी पार्टी है लेकिन बीजेपी ने उनको सीएम बनाकर बड़ा दिल दिखाया है। सबसे महत्वपूर्ण बात वाजपेयी युग में जिन मसलों को गठबंधन के लिए विवादित मानकर बीजेपी के नेता चर्चा तक नहीं करते थे वो मसले मोदी युग में बीजेपी के नेता और मंत्री मुखर होकर उठा रहे थे।

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फिर आया पार्टी पर टूट का खतरा। पहले आरसीपी सिंह बागी हुए। फिर नीतीश को ये समझ आया कि आरसीपी सिंह बीजेपी के हाथ में खेल रहे हैं और उनके जरिए जेडीयू को तोड़कर बीजेपी नित्यानंद राय या फिर आरसीपी सिंह को ही मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश कर सकती है। बस यही वो मोड़ था जहां नीतीश ने मना बना लिया कि अब बीजेपी के साथ नहीं रहना है।

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नीतीश को बीजेपी का अपनी ही पुरानी सहयोगी पार्टियों के साथ ये रवैया आहत कर गया। और फिर दोबारा महागठबंधन की सरकार बन गई। शरीर से कमजोर पड़ चुके लालू ने मन से नीतीश को सम्मान दिया और अपने बच्चों का राजनीतिक गार्जियन बना दिया। नीतीश के मन को ऐसी बातों से संतुष्टि मिलती है।

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फिर एक सवाल उठता है कि सीएम पद के लिए तेजस्वी ओके हैं तो नित्यानंद राय या आरसीपी सिंह में क्या दिक्कत थी। तकलीफ नीतीश की राजनीतिक विचारधारा से पैदा हुई। नीतीश को लगा कि अगर कुर्सी खाली करनी है तो समाजवादी राजनीति करने वाली पार्टी के लिए की जाए। अब जब नीतीश बीजेपी के खिलाफ हैं तो उसे फिर से सांप्रदायिक कह ही सकते हैं, समाज तोड़ने का आरोप लगा ही सकते हैं।

 

नीतीश की पार्टी ने पिछड़े वोटों के दम पर ही राजनीति में सफलता पाई जिसमें कई इलाकों में उसे यादवों के वोट और यादवों के नेता भी मिले। नीतीश और लालू या जेडीयू और आरजेडी का सामाजिक आधार एक है। नीतीश की पार्टी के ज्यादातर विधायक और सांसद भी इसी आधार वोट से जीतते रहे हैं। इन सबको लगा कि पिछड़ों के दोनों नेता एकजुट हो जाएं तो कम से कम कागज पर बीजेपी से 10 परसेंट अधिक वोट का जातीय गणित बन जाता है। 2014 में यह समीकरण वोट में नहीं बदला। नीतीश 2024 में इसी समीकरण से ईवीएम में घुसकर बीजेपी को बिहार में पस्त करना चाहते हैं।

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और, आखिरी बात. नीतीश विनम्र हैं लेकिन दरियादिल नहीं हैं। महीन से महीन अपमान भी वो पकड़ सकते हैं और उसे दिल से लगाकर रख सकते हैं। गिनती के लिए कारण गिने जा सकते हैं लेकिन बीजेपी से हाथ छुड़ाकर आरजेडी के पास जाने के लिए इससे ठोस कोई वजह नहीं दिखती। नहीं तो जब खुद को सीएम नहीं रहना है तो कुर्सी तेजस्वी को मिले या नित्यानंद मुख्यमंत्री बनें या आरसीपी सिंह, इससे नीतीश को बहुत फर्क नहीं पड़ता। असल में सीएम की कुर्सी अब नीतीश के लिए मसला नहीं है।

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लगभग दो दशक से नीतीश बिहार में सत्ता और पावर के केंद्र में हैं। बीजेपी की तरफ से कोई मुख्यमंत्री बनता तो यह ताकत नीतीश के हाथ से निकल जाती जो तेजस्वी के साथ उन्हें सुरक्षित दिख रही है। पत्रकारों से लेकर राजनेताओं को दिख रहा है कि महागठबंधन सरकार की दूसरी पारी में चाचा नीतीश किस तरह तेजस्वी यादव का राजनीतिक करियर बनाने का बीड़ा उठा चुके हैं वहीं दूसरी तरफ भतीजा तेजस्वी भी समर्पण भाव से शिष्यवत राजनीति और सरकार के गुर सीख रहे हैं।

ये जो अपनापन नीतीश को आरजेडी में मिल रहा है और दिख रहा है, वो बीजेपी में मिसिंग हो गया था।

 

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