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बिहार में स्वास्थ्य विभाग की तस्वीरः सरकारी अस्पताल में चपरासी करते हैं ड्रेसिंग, लेबर रूम में दाई करती है मरहम-पट्टी

 

 

सदर अस्पताल से लेकर पीएचसी तक इमरजेंसी से लेकर ऑपरेशन थियेटर में ड्रेसिंग करने के लिए चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को बुलाया जा रहा है। उनकी मदद से ही ड्रेसिंग का काम किया जा रहा है। ड्रेसर का पद खाली है।

मुजफ्फरपुर के सरकारी अस्पतालों में चपरासी और दाई मरीजों की मरहम-पट्टी करते हैं। इस काम के लिए अस्पतालों में ड्रेसर नहीं हैं। सदर अस्पताल से लेकर पीएचसी तक ड्रेसर के 78 पद हैं जिनमें सिर्फ पांच ड्रेसर ही काम कर रहे हैं। सदर अस्पताल में एक भी ड्रेसर नहीं है। यहां ड्रेसर के चार पद खाली हैं। अस्पतालों में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी मरीजों की ड्रेसिंग कर रहे हैं। इससे ड्रेसिंग सही से नहीं होती है।

सिविल सर्जन डॉ. उमेश चंद्र शर्मा ने बताया कि ड्रेसर की रिक्ति विभाग को भेजी जा चुकी है। मुख्यालय से ही ड्रेसर की बहाली होती है।

सूत्रों के मुताबिक, सदर अस्पताल से लेकर पीएचसी तक इमरजेंसी से लेकर ऑपरेशन थियेटर में ड्रेसिंग करने के लिए चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों को बुलाया जा रहा है। उनकी मदद से ही ड्रेसिंग का काम किया जा रहा है। कांटी पीएचसी के प्रभारी डॉ. सुमित संस्कार ने बताया कि उनके यहां कोई ड्रेसर नहीं है। फोर्थ ग्रेड कर्मियों से ही ड्रेसिंग का काम लिया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि ड्रेसर रहने से ऑपरेशन वाले मरीजों की मरहम-पट्टी में पूरी देखभाल मिल जाती है। ड्रेसर को बकायदा ट्रेनिंग दी जाती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि काम में कोई परेशानी नहीं है। रात में भी डॉक्टर और चतुर्थवर्गीय कर्मचारी रहते हैं। कोई गंभीर केस आने पर प्राथमिक इलाज के बाद रेफर कर दिया जाता है।

लेबर रूम में दाई कर रही हैं महिलाओं की मरहम-पट्टी

अस्पतालों के लेबर रूम में भी दाई ही गर्भवती महिलाओं की ड्रेसिंग कर रही है। सदर अस्पताल के एमसीएच से लेकर प्रखंडों के स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षित ड्रेसर नहीं हैं। अस्तताल में रहने वाली दाई ही ऑपरेशन के बाद पट्टी बदलती है और फिर से लगाती है। सही से ड्रेसिंग नहीं होन से घाव में संक्रमण का भी खतरा रहता है।

रात में गंभीर मरीज के आने पर हो जाती दिक्कत

डॉक्टरों ने बताया कि अगर अस्पताल में रात में कोई एक्सीडेंटल या गंभीर रूप से घायल आ जाए तो उसके इलाज में काफी परेशानी होती है। कई बार चतुर्थ वर्गीय कर्मी ड्रेसिंग नहीं कर पाते हैं। इसके बाद डॉक्टर को मरीज के इलाज के साथ पूरी ड्रेसिंग करनी पड़ती है। ऑर्थो विभाग में मरीज का प्लास्टर डॉक्टर ही लगाते हैं।

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