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हिमाचल में तो टेंशन बढ़ा गए बागी, लेकिन गुजरात में BJP के लिए नहीं हैं बड़ी चुनौती; समझिए कैसे

 

 

बीजेपी हिमाचल की बजाए गुजरात में बागियों से ज्यादा डर नहीं रही है। इसके पीछे प्रदेश में पिछले 27 सालों से बीजेपी की सरकार का होना और इस बार भी पार्टी की स्थिति काफी मजबूत होना है।

 

देश के दो राज्य इन दिनों चुनावी दौर से गुजर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में जहां मतदान हो चुके हैं और नतीजों की प्रतीक्षा की जा रही है तो वहीं, गुजरात में वोटिंग होने वाली है। हिमाचल में बीजेपी और कांग्रेस के बीच में प्रमुख तौर पर मुकाबला है, जबकि गुजरात में आम आदमी पार्टी ने तेज-तर्रार तरीके से प्रचार करके मुकाबला दिलचस्प बना दिया है। दोनों ही राज्यों में बीजेपी ने कई सिटिंग विधायकों के टिकटों को काटा, जिसकी वजह से बागी नेताओं की संख्या भी बढ़ गई। हिमाचल में 15 से ज्यादा बागियों ने चुनाव लड़कर बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दीं, जबकि गुजरात में भी पार्टी को इस मुश्किल से दो-चार होना पड़ रहा है। पार्टी ने रविवार को सात बागी नेताओं को निष्कासित कर दिया। इन नेताओं ने टिकट नहीं मिलने की वजह से निर्दलीय नामांकन भरा था। हालांकि, हिमाचल के उलट गुजरात में बागियों का मैदान में उतरना बीजेपी के लिए ज्यादा टेंशन वाली बात नहीं मानी जा रही है।

 

गुजरात में कितना डेंट लगाएंगे बागी?
वैसे तो किसी भी दल के लिए चुनाव की प्रत्येक सीट महत्वपूर्ण होती है। लेकिन बीजेपी हिमाचल के बजाए गुजरात में बागियों से ज्यादा नहीं डर रही। इसके पीछे प्रदेश में पिछले 27 सालों से बीजेपी की सरकार का होना और इस बार भी पार्टी की स्थिति काफी मजबूत होना है। हिंदुत्व, विकास और नए चेहरों की मदद से बीजेपी इस बार के गुजरात चुनाव में नया रिकॉर्ड बनाने की कोशिश में है। ज्यादातर सीटों पर पार्टी काफी मजबूत है।खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मंच से कह चुके हैं कि वे चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी का रिकॉर्ड भूपेंद्र पटेल तोड़ें। बीजेपी का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2002 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में था, जब पार्टी को 127 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं, 1985 में माधवसिंह सोलंकी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अब तक की गुजरात में सर्वाधिक 149 सीटें जीती थीं। पिछले चुनावों की तुलना में इस बार अधिक मजबूत होने के चलते बीजेपी को बागियों से उतना डर नहीं लग रहा है। पार्टी ने 31 मौजूदा विधायकों के टिकटों को काटा, जिसमें ज्यादातर नेताओं ने आलाकमान का निर्देश मानते हुए कोई भी बगावत नहीं की। चंद नेताओं की बगावत के चलते पार्टी को चुनावी नतीजों पर ज्यादा असर पड़ता नहीं दिख रहा है।

 

हिमाचल की बजाए गुजरात में कितना अलग है चुनाव
गुजरात के मुकाबले हिमाचल काफी छोटा राज्य है। यहां पर सिर्फ 68 विधानसभा सीटें हैं, जबकि गुजरात में 182 सीटें हैं। हिमाचल प्रदेश में बागियों ने बीजेपी की टेंशन इसलिए भी बढ़ा दी थी, क्योंकि वहां पर पिछले तीन दशकों से हर बार सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड रहा है, जबकि गुजरात में पिछले 27 सालों से बीजेपी का ही राज है। गुजरात में 2017 में जरूर कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी, लेकिन बाद में कई विधायकों के ही पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल होने के चलते कांग्रेस की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर हो गई। वहीं, एक और जिसकी वजह से बागियों को बीजेपी गुजरात में हिमाचल जैसी टेंशन नहीं मान रही है, वह यह है कि हिमाचल में बड़े नेताओं ने पार्टी से बगावत की थी। कृपाल परमार को तो खुद पीएम मोदी ने फोन करके मनाने की कोशिश की थी, लेकिन वे नहीं माने। इसके विपरीत गुजरात में बीजेपी से बगावत करने वालों में चुनिंदा ही बड़े नेता हैं। छह बार के विधायक रहे मधु श्रीवास्तव, हर्षद वसावा आदि जैसे ही बड़े नेताओं ने निर्दलीय पर्चा भरा है। ऐसे में गुजरात में बीजेपी को बागियों से ज्यादा खतरा पहुंचने की उम्मीद नहीं है।

 

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