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हरितालिका तीज है दाम्पत्य जीवन में श्रद्धा व विश्वास का बीज

 

# सुहागिन महिलाएं पति के दीर्घायु की कामना हेतु करती है निर्जला व निराहार व्रत 

दरियापुर सारण

पूरे प्रखंड क्षेत्र में पूरे निष्ठा के साथ मनाया गया यह पर्व महिलाओं द्वारा ,भारतीय संस्कृति में व्रत-उपवास व त्योहारों की लंबी परंपराओं में हरितालिका तीज की अपनी अलग महत्ता है । पति के दीर्घायु की कामना हेतु करती है सुहागिन महिलाएं निर्जला व निराहार रहकर यह 24 घंटे का कठोर व्रत। बहरहाल, हरितालिका तीज दाम्पत्य जीवन में श्रद्धा व विश्वास की बीज है।

उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान में हरितालिका तीज मनाई जाती है तो दक्षिण भारत के कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश में यह व्रत 'गौरी हब्बा' नाम से मनायी जाती है।

 *कब और कैसे श्रीगणेशित होता है यह व्रत* भाद्र पद शुक्ल  तृतीया तिथि को इस व्रत का श्री गणेश सुहागिन महिलाएं करती हैं। शिव- पार्वती की पूजा धूप, दीप नैवेद्य, नीले पीले पुष्प, फल, मिष्ठान्न, सुहाग प्रसाधन आदि से पूजा के साथ ही बिना अन्न जल से यह व्रत शुरू होता है और 24 घंटे का कठोर व्रत का समापन तिथि अवसान पर होता है। इस वर्ष 21अगस्त को शाम 2 बजकर 13 मिनट से 22अगस्त को 11 बजकर 2 मिनट तक तृतीया तिथि है। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश में चतुर्थी का करवा चौथ की परंपरा है।

 *कब से शुरू हुआ यह व्रत* इस व्रत को पहले किसने किया? कब से शुरू हुआ? इसकी कोई तिथि व वर्ष तो ज्ञात नहीं है । शिव पुराण, लिंग पुराणादिक ग्रंथों  में इस व्रत की कथा व महत्व का वर्णन मिलता है। जिसके अनुसार पार्वतीजी ने इस व्रत का शुभारंभ भगवान शिव को वर रूप में प्राप्त करने के लिए किया था। बहरहाल, शिव-शिवा का मिलन इसी तिथि को हुई थी और भारतीय संस्कृति में यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अनिवार्य हो गया ।

 *क्या है हरितालिका तीज व्रत कथा* सती दहन के बाद दूसरे अवतार में हिमांचल सुता पार्वती ने शिव को वर रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की । जिससे प्रसन्न हो कर श्रीहरि विष्णु ने राजा हिमांचल के यहाँ नारद जी द्वारा विवाह प्रस्ताव भेजा और राजा ने सहर्ष स्वीकार कर ली। किन्तु पार्वती शिव का हृदय से वर स्वीकार कर चुकी थी। बहरहाल, पार्वती की सहेली ने उन्हें जंगलों में छुपा दिया ताकि श्रीहरि से विवाह न हो। हरि तालिका शब्द हर +आलिका से बना है। यहाँ हर का अर्थ हरण और आलिका का अर्थ सखी सहेली है। कठोर व्रत के बाद पार्वती भगवान शिव की शिवा बनी। बहरहाल, यह व्रत परंपरा अनादि काल में पुरुष व प्रकृति समन्वय व आदि काल शिव- पार्वती मिलन से अर्वाचीन काल तक अनवरत चलायमान है।

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