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लीला पुरूषोंत्तम श्रीकृष्ण के चरण रज से पवित्र हुआ है,सारण

 

#कान्हा के जन्मोत्सव पर विशेष 

दरियापुर (सारण ) से अमित कुमार की रिपोर्ट

काल के प्रवाह में भौगोलिक परिवर्तन, डेमोग्राफी चेंज,परिधान व परिवेश में बदलाव प्रकृति का शाश्वत विधान है । किंतु, इतिहास के सुनहले पृष्ठों पर समय की धूल  अधिक समय तक नहीं रहा है। नासा ने द्वारिका व राम सेतु को खोज निकाला । ठीक उसी तरह लीला पुरूषोंत्तम भगवान श्रीकृष्ण की लीला भूमि सारण भी उनके पद रज से पवित्र हुई है।

 *योगेश्वर ने ली थी परीक्षा मोरधज की* अरण्यक संस्कृति का पुरोधा जिसकी भूमि सारण सभी युगों के युग पुरूषों की जन्म  व कर्म भूमि रही है।द्वापर में  दरौली आचार्य द्रोण की जन्म भूमि, अंजनी राम भक्त हनुमानजी की की जन्म भूमि न्यायमूर्ति गौतम की तपोभूमि के साथ-साथ दानवीर मोरधज की भूमि साक्षी हैं कि यह वही भूमि है जहाँ महाभारत के विजेता अर्जुन को राजा मोरधज के युवराज ताम्रध्वज का अभिमान भंग हुआ था और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण व पार्थ ने योगेश्वर व योगीराज के वेश में राजा मोरधज की परीक्षा ली थी । पुत्र ताम्रध्वज को आड़ा से चीर कर दोनों यतियों के सिंह को पुत्र मांस का भोग दिया था। बहरहाल, इस दारुण परीक्षा में भी राजा उतीर्ण हुए, पुत्र जीवित मिला और जहाँ आड़ा फेंक दिया गया था ,आज वही स्थान आरा शहर के नाम से प्रचलित है।भले ही कन्हैया मथुरा के कारागार में अवतरित हुए, तिथि थी भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी किंतु मथुरा से द्वारिका, हस्तिनापुर, कुरुक्षेत्र से लेकर गंधार व मणिपुर तक लीला पुरुषोत्तम की अद्भुत लीला श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत आदि आर्ष महाग्रंथों में है। अंग (भागलपुर) में अंगराज कर्ण की दानशीलता की  परीक्षा उन्होंने ने ली।

 *भगवान के पौत्र अनिरूद्ध का विवाह हुआ था,सारण में* गज- ग्राह संग्राम का पटाक्षेप व शैव -वैष्णव मत की संधि भूमि सोनपुर का प्राचीन नाम शोणितपुर था ,जो असुरेश्वर बाणासुर की राजधानी थी। वर्तमान नयागांव डुमरी बुजुर्ग गांव की कुलदेवी माँ कालरात्रि की साधिका चित्रलेखा असुरराज की कन्या उषा की प्रिय सहेली थी । उषा ने स्वप्न में जिस पुरुष पर मुग्ध हुई थी, वह और कोई नहीं भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न तनय अनिरुद्ध थे,जिनका अपहरण तंत्र साधिका चित्रलेखा ने किया और शोणितपुर के राजप्रासाद में पलंग सहित ला दिया। फिर असुरराज ने उन्हें बंदी  बनाकर द्वारिकाधीश को युद्ध की चुनौती दी। बहरहाल, नारायणी सेना और असुर सेना में घोर संग्राम हुए । भगवान शिवशंकर अपने वरदानी पुत्र की रक्षा हेतु स्वयं रणभूमि में उतर गए । फिर हरि व हर के एकात्मक रूप  दर्शन लाभ से बाणासुर के ज्ञान चक्षु खुल गए और उषा-अनिरुद्ध परिणय सूत्र में आबद्ध हो कर द्वारिका के लिए विदा हुए । हरि और हर के संधि स्थल आज हरिहरनाथ मंदिर है । 

 अद्भूत लिंग साक्षी है संधि स्थल का: हरिहर नाथ मंदिर में हरि ( विष्णु) और हर ( शिव शंकर) दोनों के स्वरूप लिंग में हैं । लिंग की पूर्वी भाग नीला और पश्चिमी भाग काला बीच में एक मोटी लकीर द्रष्टव्य है।लिंग के पीछे श्री हरि की खड़ी प्रतिमा ,अंडाकार प्रभा मंडल तथा उड़ते हुए गरुड़ प्रमाणित करते हैं कि भगवान श्री कृष्ण की लीला भूमि सारण रही है। बहरहाल, सच्चिदानंद स्वरुप मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, लीला पुरूषोंत्तम श्री कृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर ही क्यों आदि अनादि महाकपालिक भगवान शिवशंकर की शिव लीला  व विवाह स्थल अंबिका स्थान आमी प्रमाण है। एकोऽहमं बहु श्यामी व एकोऽहमं द्वितीय नास्ति का।

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