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पॉलिसी मेकिंग पर क्या सोचती हैं पुष्पम प्रिया चौधरी?



पब्लिक फंड का गलत प्रयोग करती है सरकार!

पटना 22 जुलाई 2020 (प्रेस प्लुरल्स) सवाल यह है कि पॉलिसी मेकिंग क्या है और यह कैसे काम करता है? यह विकास और बिहार के लिए क्यों आवश्यक है? सार्वजनिक-नीति का मतलब क्या है, यह कैसे बनता है और इसका लक्ष्य क्या होना चाहिए? सरकार अपने दावों के बावजूद किसी समूह का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. क्योंकि बिहार 73 साल पहले जहाँ था आज भी वहीं हैं, हमारे अपने देश मे सबसे पीछे. नतीजतन, ऐसा लोकतंत्र जहाँ टोकन चैलेंज मात्र हो, वह आख़िरकार एक तानाशाही व्यवस्था की तरह ही चलेगा और अंतत: फ़ेल होने के लिए अभिशप्त है जैसा कि बिहार के मामले में हुआ है. यह तब तक असफल होता रहेगा जब तक कि पॉलिसी मेकिंग के केंद्र में "लोक" नहीं आ जाता परंतु अब तक "तंत्र" केंद्रित रहा है.
प्लुरल्स की प्रेसिडेंट पुष्मम प्रिया चौधरी अक्सर अपनी बातों-वक्तव्यों में पॉलिसी मेकिंग अर्थात नीति निर्माण शब्द का प्रयोग करती रहती हैं.   उन्होंने बताया कि "आपने देखा होगा मैं पॉलिसी-निर्माण शब्द का खूब इस्तेमाल करती हूँ. पहला तो इसलिए क्योंकि पॉलिसी-निर्माण में यह क्षमता है कि वह हमारे जीवन को सही अर्थों में बदल सकती है या बर्बाद कर सकती है. दूसरा और जो ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि मैं चाहती हूँ कि “हम” इसके बारे में बात करें, इसे प्रश्न करें, इसकी आलोचना करें और सबसे जरूरी है कि इसकी “माँग” करें. जिस पॉलिटिक्स की मैं बात करती हूँ उसका मतलब है पॉलिसी-निर्माण और लोकतंत्र इसलिए क़ीमती है कि यह मतदाताओं को यह अवसर देता है कि वो अच्छी पॉलिसी को चुन सकें और ख़राब को ख़ारिज कर सकें."  पुष्मम प्रिया चौधरी का मानना है कि "दुर्भाग्यवश, राजनेता लोग न तो चुनावों में पॉलिसी की बात करते हैं, न तो इसका मतलब उन्हें पता है और न ही वे इसे बनाना जानते हैं. बहरहाल, क्या “पब्लिक पॉलिसी” का मतलब स्वतः ही स्पष्ट नहीं है - पब्लिक के लिए पॉलिसी? इसका जवाब हाँ भी है और ना भी. यह इतना सरल नहीं है जितना इसके शाब्दिक अर्थ से लगता है."
 सुश्री चौधरी अपनी पॉलिसी मेकिंग की अवधारणा को समझाने के लिए एक उदाहरण देते हुई बताती हैं कि "जब मैं बच्ची थी तो मेरी दादी मुझे राजाओं की कहानियाँ सुनाया करती थीं जिनमें वे जब भ्रमण पर ज़ाया करते थे तो अपने मंत्रियों को मनमाने आदेश दिया करते थे - 'राजा को फूल इतना पसंद आया कि उसने आदेश दिया कि हम चाहते हैं कि यह फूल मेरे पूरे साम्राज्य में लगा दिया जाए.'  इसी तरह से आज भी बिहार में पब्लिक पॉलिसी का निर्माण होता है. लेकिन इसे पॉलिसी बनाना नहीं कहते हैं बल्कि यह पब्लिक फ़ंड का ग़लत तरीक़े से ग़लत दिशा में प्रयोग है, ‘जनता के मत और जनता की शक्ति’ का दुरुपयोग है.

अपने शोध और अनुभवों के आधार पर पुष्मम प्रिया चौधरी ने बताया कि "आज मैं उस भूमिका में आपसे बात करना चाहती हूँ जो वास्तव में मैं हूँ - एक अंतर्राष्ट्रीय विकास की प्रैक्टिशनर के रूप में. असली विकास सिर्फ़ “साक्ष्य-आधारित पॉलिसी निर्माण” पर ही आधारित होता है. नीति-निर्माता और उसको लागू करने वाले लोगों के जीवन में पॉलिसी निर्माण के माध्यम से हस्तक्षेप करते हैं. ये हस्तक्षेप अवांछित प्रभाव डाल सकते हैं और भले से ज़्यादा बुरा भी कर सकते हैं. इसलिए लोगों को दिए जाने वाले ‘नुस्ख़े और निषेध’ को बहुत ही मेहनत से शोध किए गए ‘अनुभवजन्य साक्ष्यों’ पर आधारित होना चाहिए. यह बहुत ही ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बात होगi कि मनमर्ज़ी से या विश्वसनीय सबूतों के बिना बनाए गए सिद्धांतों के माध्यम से लोगों के जीवन में हस्तक्षेप किया जाए. ये सबूत गहन विश्लेषण पर आधारित होते हैं और इसलिए किसी हस्तक्षेप से पड़ने वाले प्रभावों जो आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक, मनो-वैज्ञानिक या कुछ भी हो सकता है, को समझने के लिए आवश्यक होते हैं. इस बात पर कोई समझौता नहीं हो सकता क्योंकि ‘लोग महत्वपूर्ण हैं’ और उनकी मेहनत से अर्जित की गई टैक्स की रक़म भी.
पुनः दुनिया भर में लागू की जाने वाली पॉलिसी को वर्षों तक अकादमिक शोधार्थियों से द्वारा अध्ययन किया जाता है ताकि यह समझा जा सके कि वे पॉलिसी कितने फ़ायदेमंद रहे और इस ज्ञान का प्रयोग उन सबूतों के साथ मिलाकर किया जाता है जो उस जगह की भौगौलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक व आर्थिक पृष्ठभूमि पर आधारित होती हैं जहां इसे लागू किया जाना होता है. अगर इस बात का कोई सबूत न हो कि किसी पॉलिसी ने दुनिया भर में कुछ भी भला किया है तो उसे नहीं अपनाया जा सकता. रोचक बात यह है कि बिहार में वैसी पॉलिसी “राजनीतिक मनमर्ज़ी” से लागू की जाती हैं जो दुनिया भर में असफल हो चुकी हैं.
बिहार सरकार पॉलिसी मेकिंग की क्षमता पर संदेह करते हुए पुष्पम प्रिया चौधरी ने कहा कि "मेरा सवाल है कि बिहार एक निरंकुश तानाशाही है या एक राजतंत्र?
इस व्यवहार को रोके जाने की और सवाल खड़े किए जाने की ज़रूरत है. तार्किकता, वैज्ञानिक सबूत आधारित ज्ञान या किसी भी प्रकार के ज्ञान का बिहार की राजनीति में महत्व ख़त्म हो चुका है. लेकिन, हमें इसे निश्चित रूप से जीवित रखने की ज़रूरत है. उस समाज का उसी दिन निरादर और तिरस्कार शुरू हो जाता है जिस दिन वो “ज्ञान और बहस” की परम्परा ख़त्म कर दे. लोग अक्षम, अपर्याप्त व अतार्किक तरीक़े के शासन के कारण रोज़ मरते हैं और इसलिए हमारे ऐसे नागरिक जो झेल रहे हैं उसे हम नज़रंदाज़ करने का ख़तरा नहीं मोल ले सकते क्योंकि हम तभी तक सुरक्षित हैं जब तक हमारी बारी नहीं आ जाती है.
राजनीतिक वर्ग जनता को सूचनाएँ देने के बजाय उससे छुपा कर इसे अपने फ़ायदे के लिए उपयोग करने में सफल रहा है. प्रत्येक अच्छी तरह से काम कर रहे लोकतंत्र में दो प्रमुख संस्थागत शक्ति होती हैं एक, सरकार द्वारा शासन में एजेंडा तय करना, और दूसरा, सवाल पूछना या अन्य विधायी सदस्यों के द्वारा उस पर अंकुश लगाना.  बिहार के मामले में, दोनों एजेंडा निर्माता और विपक्ष केवल अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए काम करते हैं. हमारी गंभीर समस्याओं को पूरे सिस्टम द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है इसके अलावा ज्ञान की कमी के कारण हमारी समस्या का समाधान खोजने मे और सवाल करने में असफल रहते हैं.

प्लुरल्स के गठन और लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता प्राप्त करने के पीछे की अवधारणा को स्पष्ट करती हुई कहती हैं कि "यह चुनाव एक अवसर गँवाने जैसा होगा यदि सत्तारूढ़ दल या तथाकथित विपक्ष जीत जाएँ. सत्तारूढ़ दल बेशक अपनी सरकार को प्रश्न करेंगे नहीं और विपक्ष तो निस्सन्देह ही पॉलिसी ज्ञान से वंचित ही है जो सरकार को प्रश्न कर ही नहीं सकता. यह प्राथमिक कारण है जिसका हम इरादा करते हैं एक नई पार्टी का गठन करके प्रणाली को चुनौती देना जो सक्षम हो. हम सभी दलों के खिलाफ खड़े हैं ताकि इन पार्टियों ने पिछले सालों में जो निर्णय लिए या नहीं लिए उनको सवाल कर सकें."
पुष्मम प्रिया चौधरी का मानना है कि "तंत्र" आधारित पॉलिसी मेकिंग को उल्टा करके उसकी जगह "लोक" आधारित पॉलिसी मेकिंग बनाने का समय आ गया है.

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